ज्ञान की बात करते ही शायद आप ने भी कभी महसूस किया हो कि ज्ञान शब्द का नाम सुनते ही मन मस्तिष्क में अपरिभाषित विचारों का भॅवर सा बन पड़ता है। और इंसान महसूस करता है कि वह ज्ञान से चिरपरिचित हो परन्तु इसके विषय में महज शब्दांगो के प्रस्फुटन हेतु उसे इन सहज कठिनाइयों के संदमन में समय जरूर लग जाता है। हॉलाकि इस विषय पर इंसान निर्बाध होते हुए भी बाधित महसूस करता है।
इस विवेचना से और कुछ हो न हो लेकिन कहीं न कहीं ज्ञान की सीमा जरूर परिलक्षित होती नजर आती है। ज्ञान अपरिमित है यह सर्व विदित है।
शायद यह बात मैने अपने इस लेख के शुभारम्भ के समय ही महसूस किया है। कुछ भी हो सबसे पहले हम ज्ञान को परिभाषित करने की बात करें, वैसे तो ज्ञान को एक लाइन में परिभाषित करना किसी भी आसहाय कार्य से कम नहीं है। तो ज्ञान वह अमूल्य, सहस्र, अक्षय, संसाधन है जो किसी उद्देश्य की पूर्ति का आधार बनता है।
युग युगान्तर से भी ज्ञान ही सर्वोपरि रहा है और समय-समय पर ऋषियों, मुनियों, विदुषियों, दर्शनिको एवं विद्वानों ने ज्ञान को अपने-अपने अनुसार परिभाषित कर इसकी विशेषताओ का उल्लेख जरूर किया है, लेकिन सभी वर्णनों के सारांश से जो बात सामने आती है। वह यह है, ज्ञान के अभारिता, अभाज्यता, अधीनता, अध्ययनशीलता, न चुराये जा सकने वाला तथा व्यय कृते वर्धेष्ता जैसे विलक्षणीय गुण इससे छुपे नहीं हैं फिर विभिन्न संदर्भो में अधात्र परिक्षेपों में इसके गुण असंखय है।
ज्ञान अभौतिक है फिर भी समस्त भौतिक वस्तुओं तथा स्थितियों के सृजन की क्षमता भी केवल ज्ञान से ही है। जैसे कि विभिन्न मौलिक वस्तु का सृजन मनुष्य ने अपने अर्थोक्ति ज्ञान से ही किया है। यहॉं तक की भौतिक एवं सांसरिक ज्ञान भी अर्थोक्त होता हैं ज्ञान का संबंध मन मस्तिष्क से भी है, मन का संबंध ज्ञान से नजदीकी है क्योंकि मन अभौतिक है तथा मस्तिष्क भौतिक है, मन को देखा हुआ नहीं है जैसे ज्ञान को, इन का अनुभव ही व्याखयता होता है। मन और मस्तिष्क को हम दैनिक जीवन के पुष्प और उसके सुगंध से भी समझा जा सकता, जिस प्रकार भौतिक पुष्प अभौतिक सुगंध का प्रवाह होता है वैसे भौतिक मस्तिष्क से अभौतिक मन का भी। ज्ञान का संबंध मन से इस प्रकार स्थापित किया जा सकता है, कि मन मस्तिष्क इंद्रियों के संगठनात्मक संचालन की उपज है। मन चंचल होता है। लेकिन इसका नियंत्रण मनुष्य द्वारा अर्जित, उपार्जित एवं अधिगमित ज्ञान ही करता है। ज्ञान ही मनुष्य में बुद्धि एवं विवेक का निर्माण करता है। तथा इनसे अवचेतनों को संदर्भित भी करता है।
इस प्रकार ज्ञान अभौतिक शक्ति एवं प्रकाश है। जो अच्छाइयों-बुराईयों के अवबोधन का साधन है। सद्ज्ञान मनुष्य को अनैतिक रास्तों से विचलित तथा नीतगत पथ को प्रशस्ति करने वाला भी होता है। इस प्रकार ज्ञान का प्रयोग पूर्णतः अव्यावसायिक है।
सद्ज्ञान से शांति निहित अध्यावसायी प्रयासों के द्वारा दुर्लभ लक्ष्य को भी साधा जा सकता है।
ज्ञानार्जन का एक मात्र साधन शिक्षा है चाहे वह औपचारिक, अनौपचारिक या निरौपचारिक हो, शुद्ध स्वरूप में अर्जित के प्रयोग के कल इसे प्रयोग किये जाने के ढंग् व प्रयोग किये जाने की दिशा पर निर्भर करते है। जिस प्रकार परमाणु ऊर्जा का ज्ञान विध्वंसात्मक कार्यो एवं रचनात्मक कार्यो, दोनो में प्रयोग किया जा सकता है। फिर भी ज्ञान का उचित प्रयोग सदा ही कल्याणकारी ही होता है।
ज्ञान को उचित रूप में प्राप्त किया जाना अति आवश्यक है। अन्यथा एक कुशल डॉक्टर जो भगवान तो होता है, जीवन देने के बजाय मरीजो की किडनी भी निकाल सकता है। बस यह निर्भर इस बात पर करता है कि उसका समुचित ज्ञान किस हद तक संतुलित है।
इन बातों के अतिरिक्त ज्ञान के विविधता एवं इसे वर्तमान परिवेश में स्थिति की बात करें तो भी एक रोचक स्थिति हो , ज्ञान की विविधता प्राचीनकाल से ही हो रही है, जैसे कि विश्वविख्यात ज्ञान, कष्टात्मक ज्ञान , प्रकृति ज्ञान, तकनीकि ज्ञान, भाषायी ज्ञान, भौतिक एवं अभौतिक ज्ञान और दार्शनिक ज्ञान चाहें जो भी हों बस ज्ञान तो ज्ञान ही है। लेकिन वर्तमान परिवेश में यद्यपि मूल ज्ञान की जड़ें एक ही हो। परन्तु इनकी शाखा रूपी विविधता में आशातीत वृद्धि हुई है। जिसमें हरी पत्तियां और फल भी लग रहे है। परन्तु इस निरन्तर विकासोन्मुख संसार में ज्ञान के कुछ पहलुओं पर चिन्तन और मनन किया जाना नितांत आवश्यक है। सही अर्थो में विकास, ज्ञान का ही विकास है। वर्तमान स्थिति में यदि हम देख ले तो चाहें कोई विकसित राष्ट्र जैसे अमेरिका, रूस, जर्मनी, फ्रांस, इंग्लैण्ड इत्यादि या फिर भारत, चीन जैसे विकासशील देश हो इन सबके तत्व इन सबके तत्कालीन स्थिति के कारण इनके द्वारा किये गये ज्ञान में विकास ही है, चाहे वह तकनीकी कुशलता हो या कुछ और ....... ज्ञान का व्यावहारिक जीवन में उपयोगिता एवं जीवन की निरंतरता का आस्तित्व सबमें अपरिहार्य है। ज्ञान को सहज शुरूआतों से शुरू कर बड़े अनुभव में परिणत किया जा सकताहै। ज्ञान ही वह चीज है जो प्रकृति की अनुपम अनुकृतियों में उत्पालवनता, समीपता भरता है।
अतः मैं यह कहना चाहूॅंगा कि आदि गुरू शंकराचार्य जीन ठीक ही कहा था कि 'या विद्या सा, विमुक्तये' जो आज भी चरितार्थ है तथा मैं यह भी कहना चाहूॅगा कि ज्ञान के विषय में बात करना भी बस ज्ञान की बात है।